चंद्रयान-2 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सतह के नीचे संभावित बर्फ़ का पता लगाया
चंद्रयान-2 के डीएफएसएआर उपकरण से प्राप्त रडार आँकड़ों के आधार पर इसरो वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास चार दोहरे छाया-गर्तों में सतह के नीचे संभावित बर्फ़ की मौजूदगी की रिपोर्ट दी है।
2019 में प्रक्षेपण के लगभग छह वर्षों बाद भी भारत का दूसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-2 नई वैज्ञानिक जानकारी प्रदान कर रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के वैज्ञानिकों ने ऑर्बिटर के डुअल फ़्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (डीएफएसएआर) उपकरण के आँकड़ों के आधार पर चंद्रमा के दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र के चार “दोहरे छाया-गर्तों” की सतह के नीचे संभावित बर्फ़ की उपस्थिति बताई है।
दोहरे छाया-गर्त वे छोटे गर्त हैं, जो बड़े स्थायी छाया-क्षेत्रों (पीएसआर) के भीतर स्थित हैं। सीधी सूर्य-किरणों एवं आसपास के भू-भाग से परावर्तित तापीय विकिरण से सतत बचाव होने के कारण इन क्षेत्रों का तापमान बहुत कम — कुछ दर्जन केल्विन तक — रह सकता है। ऐसा ठंडा एवं अंधेरा वातावरण भूगर्भीय कालखंडों तक पानी-बर्फ़ संरक्षित रखने के लिए आदर्श माना जाता है। यही कारण है कि इसरो एवं नासा जैसे संगठन चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव को भविष्य के मिशनों एवं अड्डों के लिए लक्षित कर रहे हैं।
पीआरएल टीम ने उन्नत रडार पोलारीमेट्रिक विश्लेषण से सतह के नीचे बर्फ़ के अनुरूप संकेत पहचाने। उन्होंने एक परिष्कृत मापदंड प्रस्तावित किया — “वृत्तीय ध्रुवण अनुपात (सीपीआर) 1 से अधिक और ध्रुवण मात्रा (डीओपी) 0.13 से कम” हो तो यह सतह के नीचे बर्फ़ से उत्पन्न आयतनिक प्रकीर्णन का संकेत है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल सीपीआर पर आधारित पुरानी व्याख्याएँ अस्पष्ट हो सकती थीं, क्योंकि खुरदरी सतह की चट्टानें भी उच्च सीपीआर दे सकती हैं।
अभ्यर्थियों के लिए यह खोज भारत के चंद्र कार्यक्रम के संदर्भ में जुड़ती है — चंद्रयान-1 (2008 में चंद्रमा पर पानी की पुष्टि), चंद्रयान-3 (अगस्त 2023 में दक्षिण ध्रुव के निकट विक्रम की सफल लैंडिंग) तथा प्रस्तावित चंद्रयान-4 (नमूना-वापसी मिशन)। यह जापानी जाक्सा के साथ इसरो की लूपेक्स योजना से भी जुड़ा है, जो इसी क्षेत्र को लक्षित करती है।
याद रखने योग्य मुख्य बिंदु
- मिशन: चंद्रयान-2 (प्रक्षेपण 2019); ऑर्बिटर अब भी सक्रिय
- उपकरण: डुअल फ़्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (डीएफएसएआर)
- स्थान: चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के पास चार दोहरे छाया-गर्त (पीएसआर के भीतर)
- मापदंड: सीपीआर > 1 तथा डीओपी < 0.13
- महत्व: सतह की चट्टानों से सतह के नीचे की बर्फ़ को अलग पहचानने का बेहतर मानक
- भारतीय चंद्र कालक्रम: चंद्रयान-1 (पानी, 2008), चंद्रयान-3 (विक्रम, अगस्त 2023), चंद्रयान-4 (नमूना-वापसी)
- संबंधित: जाक्सा के साथ लूपेक्स
परीक्षा प्रासंगिकता
यूपीएससी (विज्ञान एवं तकनीकी — भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम, इसरो), एसएससी, बैंकिंग, रक्षा एवं राज्य पीसीएस के लिए उपयोगी।
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