महंगाई की चिंता के बीच RBI ने June 2026 की MPC बैठक में ब्याज दरें स्थिर रखीं
अपनी June 2026 की बैठक में RBI की Monetary Policy Committee ने policy दर और रुख को अपरिवर्तित रखा, जबकि wholesale inflation 42 महीने के उच्चतम स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे यह बहस छिड़ गई कि क्या केंद्रीय बैंक को विदेशी पूंजी आकर्षित करने के उपायों पर निर्भर रहने के बजाय दरें बढ़ानी चाहिए थीं।
June 2026 में शुक्रवार को हुई अपनी बैठक में Reserve Bank of India की Monetary Policy Committee (MPC) ने policy ब्याज दर को अपरिवर्तित रखने और अपने मौजूदा policy रुख को बनाए रखने का फैसला किया। MPC छह सदस्यों का एक पैनल है जो repo rate तय करता है, यानी वह दर जिस पर RBI बैंकों को short-term पैसा उधार देता है। इस फैसले की आलोचना हुई है क्योंकि committee के अपने ही अनुमान एक चिंताजनक दिशा की ओर इशारा करते हैं: जहां 2026-27 के लिए विकास का अनुमान 30 basis points (एक basis point प्रतिशत का सौवां हिस्सा होता है) घटाया गया, वहीं उसी साल के लिए महंगाई का अनुमान इसका दोगुना यानी 60 basis points बढ़ा दिया गया। आलोचक कहते हैं कि जब संतुलन कमजोर विकास की तुलना में बढ़ती कीमतों की ओर ज्यादा झुक रहा हो, तो बड़ा खतरा महंगाई का होता है, और इसे देखते हुए कदम उठाया जाना चाहिए था।
महंगाई के संकेत पहले से ही चमक रहे हैं। Wholesale price inflation, जो थोक या उत्पादक स्तर पर कीमतों के बदलाव को मापती है, 42 महीने के उच्चतम स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है। Consumer Price Index से मापी जाने वाली retail inflation कुछ कम इसलिए दिखती है क्योंकि एक अवधि तक ईंधन की कीमतें अपरिवर्तित रखी गई थीं, जिससे headline आंकड़ा बनावटी रूप से नीचे रहता है। RBI का अपना baseline अनुमान कहता है कि headline inflation 2026-27 की तीसरी तिमाही में बढ़कर करीब 5.9 प्रतिशत हो जाएगी, जो इसके 2 से 6 प्रतिशत के सहनशीलता दायरे के ऊपरी किनारे को छूने लगेगी। चूंकि monetary policy तीन से चार तिमाहियों की देरी से असर करती है, इसलिए अर्थशास्त्री कहते हैं कि RBI को उन कीमतों को काबू करने के लिए आज ही कदम उठाना होगा जो महीनों बाद चरम पर पहुंचेंगी। स्थिर रहकर committee यह जोखिम उठा रही है कि real interest rate (repo rate में से महंगाई घटाने पर बचा हिस्सा) शून्य के करीब गिर जाए और शायद नकारात्मक भी हो जाए, जिससे मांग को ठंडा करने में बहुत कम मदद मिलेगी।
दरों पर कदम उठाने के बजाय, RBI गवर्नर ने भारतीय बाजारों में विदेशी पैसा आकर्षित करने के उद्देश्य से कई कदमों की घोषणा की। इनमें Fully Accessible Route के तहत विदेशी निवेशकों के लिए खुली securities की सूची बढ़ाना, short-term और केंद्रित portfolio निवेश पर सीमाएं आसान करना, Non-Resident Indians (NRIs) से आगे बढ़कर व्यक्तियों को equity निवेश की अनुमति देना, और external commercial borrowings तथा NRI deposits के लिए प्रोत्साहन देना शामिल है, जिसमें currency-hedging लागत का एक हिस्सा प्रभावी रूप से सरकार और RBI उठाएंगे। Hedging का मतलब है रुपये के मूल्य में बदलाव के जोखिम के खिलाफ बीमा करना; इस बीमे की एक लागत होती है। आलोचक चेतावनी देते हैं कि ये कदम असली समस्या को ठीक करने के बजाय short-term, अस्थिर पूंजी, जिसे अक्सर hot money कहा जाता है, के पीछे भागते हैं।
गहरी समस्या भारत का current account deficit है, जो तब पैदा होता है जब देश अपनी कमाई और बचत से ज्यादा आयात और उपभोग करता है। रुपये पर हाल का दबाव तुरंत West Asia में तनाव और Strait of Hormuz, जो तेल भेजने का एक प्रमुख रास्ता है, के आसपास की बाधा से जुड़ा है, लेकिन यह एक लंबे समय से चले आ रहे असंतुलन को भी दर्शाता है। एक पूर्व RBI गवर्नर ने विशेष NRI bonds जारी करने वाले 2013 के 'taper tantrum' तरीके को दोहराने के खिलाफ आगाह किया है, और कहा है कि अब वैश्विक स्थिति बहुत अलग है: liquidity तंग है और विदेश में ब्याज दरें ऊंची हैं, इसलिए ऐसा उधार कहीं ज्यादा महंगा पड़ेगा। तर्क यह है कि deficit को एक साथ दोनों तरफ से निपटाना होगा, यानी अत्यधिक उपभोग पर लगाम लगाना और स्थिर विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करना, और एक संतुलित ब्याज दर वृद्धि साफ-सुथरा औजार है क्योंकि यह एक साथ खर्च को ठंडा करती है, विदेशी कर्ज को खींचती है और महंगाई पर लगाम लगाती है।
परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए यह बहस UPSC, banking और State PCS परीक्षाओं के monetary policy का एक बेहद उपयोगी case study है। MPC की संरचना और भूमिका, repo rate का अर्थ, real interest rate, wholesale बनाम retail inflation, 4 (+/-2) प्रतिशत का महंगाई लक्ष्य दायरा, current account deficit, Fully Accessible Route, और hot money स्थिर विदेशी निवेश से किस तरह अलग है, यह सब याद रखें। प्रश्न अक्सर विकास और महंगाई के बीच के समझौते (trade-off) और ब्याज दरों से कीमतें काबू करने बनाम capital-flow उपायों से रुपये को संभालने के बीच के अंतर को परखते हैं।
याद रखने योग्य मुख्य बिंदु
- RBI की Monetary Policy Committee (MPC) ने June 2026 की बैठक में policy repo rate और रुख को अपरिवर्तित रखा।
- 2026-27 के लिए विकास का अनुमान 30 basis points घटाया गया जबकि महंगाई का अनुमान 60 basis points बढ़ाया गया।
- Wholesale price inflation 42 महीने के उच्चतम स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंची; headline inflation 2026-27 की Q3 में करीब 5.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो ऊपरी सहनशीलता सीमा के करीब है।
- RBI ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए कदम घोषित किए, जिनमें Fully Accessible Route का विस्तार और NRI deposits तथा external commercial borrowings को प्रोत्साहन देना शामिल है।
- Monetary policy तीन से चार तिमाहियों की देरी से असर करती है, इसलिए कम या नकारात्मक real interest rate भविष्य की महंगाई को हवा देने का जोखिम पैदा करती है।
- Current account deficit को उपभोग (लगाम लगाकर) और capital flows (प्रोत्साहित करके) दोनों मोर्चों पर निपटाना होगा।
परीक्षा प्रासंगिकता
UPSC, banking और State PCS परीक्षाओं के लिए Indian Economy के अंतर्गत प्रासंगिक, जिसमें RBI Monetary Policy Committee, repo rate, inflation targeting और current account deficit प्रबंधन शामिल हैं।
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