सुप्रीम कोर्ट: दहेज और क्रूरता के मामलों में पति के रिश्तेदार स्वतः दोषी नहीं
25 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज और क्रूरता के मामलों में पति के रिश्तेदार केवल हस्तक्षेप न करने या पत्नी को समायोजन की सलाह देने पर आपराधिक रूप से दोषी नहीं हो सकते, जब तक सक्रिय भागीदारी का स्पष्ट प्रमाण न हो। पीठ ने विशिष्ट आरोपों पर जोर दिया।
25 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों को केवल इस आधार पर आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वे हस्तक्षेप करने में विफल रहे, या उन्होंने पत्नी को विवाह में "समायोजन" करने की सलाह दी, जब तक यह स्पष्ट प्रमाण न हो कि उन्होंने कथित क्रूरता या दहेज उत्पीड़न में सक्रिय भूमिका निभाई। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मध्य प्रदेश के गुना से जुड़े एक मामले में यह निर्णय दिया।
अदालत ने पति के चार परिवार सदस्यों — सास, ननद और देवर सहित — के विरुद्ध दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा कानूनों के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। पीठ ने कहा कि जहाँ घरेलू हिंसा के पीड़ितों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा बहुत महत्वपूर्ण है, वहीं अदालतों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि स्पष्ट तथ्यात्मक आधार के बिना आपराधिक कानून को परिवार के हर सदस्य तक न खींचा जाए।
ऐसे मामलों के लिए मानदंड तय करते हुए अदालत ने कहा कि प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध आरोप विशिष्ट, अलग और प्रथम दृष्टया सामग्री से समर्थित होने चाहिए जो क्रूरता, उत्पीड़न या दहेज की अवैध माँग में सक्रिय भागीदारी दर्शाए। केवल यह कहना कि परिवार के सदस्यों ने पति का समर्थन किया या हस्तक्षेप नहीं किया, अपने आप आपराधिक दायित्व नहीं बनाता। अदालत ने चेताया कि आपराधिक कानून पारिवारिक रंजिश निपटाने का साधन नहीं बन सकता और निचली अदालतों से ऐसे रिश्तेदारों पर मुकदमे की अनुमति देने से पहले "अधिक सावधानी" बरतने को कहा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का यह अर्थ नहीं कि रिश्तेदारों पर कभी मुकदमा नहीं चल सकता। जहाँ विशिष्ट कृत्यों या प्रत्यक्ष भागीदारी का स्पष्ट प्रमाण हो, वहाँ ऐसे रिश्तेदार मुकदमे का सामना कर सकते हैं। इस मामले में विवाह 2019 में हुआ और पत्नी की एफआईआर 2023 में दर्ज हुई थी।
याद रखने योग्य मुख्य बिंदु
- न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मध्य प्रदेश के गुना के मामले में निर्णय दिया।
- सक्रिय भागीदारी के प्रमाण बिना वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदार स्वतः दोषी नहीं।
- प्रत्येक आरोपी के विरुद्ध आरोप विशिष्ट, अलग और प्रथम दृष्टया सामग्री से समर्थित होने चाहिए।
- अदालत ने चेताया कि आपराधिक कानून पारिवारिक रंजिश निपटाने का साधन न बने।
- स्पष्ट प्रमाण होने पर रिश्तेदारों पर अब भी मुकदमा चल सकता है।
परीक्षा प्रासंगिकता
UPSC, राज्य PCS और न्यायपालिका परीक्षाओं (राजव्यवस्था एवं आपराधिक कानून) के लिए प्रासंगिक: दहेज, क्रूरता और घरेलू हिंसा प्रावधानों की न्यायिक व्याख्या।
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